शिक्षा मनोविज्ञान की विभिन्न शिक्षण-विधियाँ
शिक्षण में प्रयुक्त की जाने वाली प्रमुख पद्धतियाँ निम्न हैं-
(1) पाठ्य-पुस्तक पद्धति-
पाठ्य-पुस्तकें शिक्षण-प्रक्रिया में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। बहुधा यह कहा जाता है कि भारत में समस्त शिक्षण कार्य इस पद्धति से किया जाता है। लेकिन यह कथन अनिर्दिष्ट-सा प्रतीत होता है, क्योंकि हर शिक्षण पद्धति का प्रयोग पाठ्य-पुस्तक को आधार बनाकर किया जा सकता है। इसलिए स्पष्ट हो जाता है कि पाठ्य-पुस्तक वह उपकरण है जिसके द्वारा किसी निर्दिष्ट उद्देश्य अथवा तथ्य को प्राप्त किया जा सकता है। इस तरह हम कह सकते हैं कि पाठ्य-पुस्तक एक स्वतंत्र शिक्षण पद्धति नहीं है, बल्कि यह वह प्रक्रिया अथवा माध्यम जिसके द्वारा ज्ञान अर्जित किया जा सकता है। लेकिन आधुनिक मनोवैज्ञानिक विचारधारा ने इस पद्धति को निन्दनीय घोषित किया है। वह इसको परंपरागत पद्धति की संज्ञा प्रदान करती है। एडम्स वेस्ले के मतानुसार, "पाठ्य-पुस्तक की विधि शिक्षण की वह प्रक्रिया है जिसमें पाठ्य-पुस्तक पर अधिकार प्राप्त करना हमारा तात्कालिक ध्येय होता है।"
इस विधि में सामाजिक विज्ञान की किसी एक पुस्तक को अथवा एक प्रकरण के लिए कर्ड पस्तकों को पाठ्य-पुस्तक के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता हे। पुस्तक का पठन सस्वर या मौन-दोनों ही रूपों में कराया जा सकता है है। इस पद्धति का प्रयोग निम्न रूपों में किया जा सकता है-
1. किसी तथ्य अथवा विचार को कंठस्थ करने हेतु इसका प्रयोग किया जा सकता है।
2. इस पद्धति का दूसरा उपयोग पाठ को पूर्णतया रटने के साथ-साथ उसके भावों को ग्रहण करने के लिए किया जाता है। इस उपयोग के द्वारा छात्रों में अर्जिन ज्ञान को अपने शब्दों में अभिव्यक्त करने की क्षमता आ जाती है।
3. इसके तीसरे रूप में शिक्षक के द्वारा किसी पाठ अथवा प्रकरण को अध्ययन के लिए निर्धारित कर दिया जाता है। छात्रों में इसके अध्ययन के बाद उसका सारांश लिखने अथवा समानांतर विवरण प्रदान करने के लिए कहा जाता है। शिक्षक एवं बालक मिलकर इस सारांश पर दूसरे दिन विचार-विमर्श करते हैं तथा उसके विषय में निश्चित धारणा अथवा निष्कर्ष का निर्माण करते हैं।
4. पाठ्य-पुस्तक-पद्धति के प्रयोग का अंतिम रूप यह है कि शिक्षक पाठ्य-पुस्तको के पाठों के आधार पर अपना पृथक कार्य निर्धारित करता है, जिसमें पाठ की समस्त बातें आ जाती हैं। लेकिन इस कार्य का निर्धारण इस तरह किया जाता है कि छात्रों को उसकी पूर्ति हेतु अन्य पुस्तकों-संदर्भ अथवा स्त्रोत पुस्तको पत्र-पत्रिकाओं आदि का उपयोग करना पड़े। शिक्षक छात्रों को उन स्त्रोतों के बारे में बता देता है, जहाँ से निर्धारित कार्य की विषय सामग्री प्राप्त होगी। छात्र स्वयं उनसे संबंधित सूचनाओं का संकलन करते हैं। इस तरह इससे कई पुस्तकों के प्रयोग पर बल दिया जाता है।
पाठ्य-पुस्तक पद्धति के गुण-
1. स्वाध्याय की आदत का निर्माण करना।
2. स्मरण-शक्ति का विकास करना ।
3. कार्य में व्यवस्था स्थापित करने में मददगार।
4. ज्ञानार्जन का मितव्ययी साधन ।
5. किसी प्रकरण के लिए कितनी सूचना प्राप्त करनी चाहिए, इसका निश्चित अनुमान बालकों को प्राप्त हो जाता है।
पाठ्य-पुस्तक पद्धति के दोष-
1. वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करने में असमर्थ ।
2. रटने की प्रवृत्ति का विकास ।
3. यह शिक्षण के सूत्रों; जैसे-'सरल से कठिन की ओर', 'मनोवैज्ञानिक से तर्कसम्मत क्रम की तरफ' आदि की अवहेलना करता है।
4. कक्षा के वानावरण को अरुचिकर तथा नीरस बनाती है।
5. छात्रों में मुद्रित पृष्ठों का अंधानुकरण करने की भावना का विकास करती है।
6. उनके मानसिक अंतरिक्ष को विस्तृत करने में असमर्थ है।
(२) योजना-पद्धति-
इस पद्धति के जन्मदाता अमेरिका के श्री किलपैट्रिक महोदय हैं। इस पद्धति का निर्माण प्रयोजनवाद के सिद्धांतों को आधार बनाकर किया गया है। श्री किलपैट्रिक ने 'प्रोजेक्ट' शब्द को इस प्रकार परिभाषित किया-
"प्रोजेक्ट वह सहृदयपूर्ण अभिप्राययुक्त क्रिया है जो पूर्ण संलग्नता के साथ सामाजिक वातावरण में संपन्न की जाती है।"
किलपैट्रिक ने 1921 में पुनः इस शब्द को नये रूप से इस तरह परिभाषित किया-"प्रोजेक्ट अभिप्राययुक्त अनुभव की इकाई है, जिसमें आंतरिक इच्छा के रूप में क्रिया के उद्देश्य को निर्धारित तथा उसकी प्रक्रिया को पथ-प्रदर्शित करती है, एवं उसकी आंतरिक प्रेरणा को उपयुक्त बनाती है।"
प्रो. स्टेवेन्सन के अनुसार, "प्रोजेक्ट एक समस्यामूलक कार्य है जिसका हल स्वाभाविक वातावरण में ही किया जाता है।"
प्रो. बैलार्ड के अनुसार, "प्रोजेक्ट वास्तविक जीवन का एक छोटा-सा टुकड़ा है जिसको विद्यालय में प्रतिपादित किया जाता है।"
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि प्रोजेक्ट एक समस्यात्मक ढंग से कार्य को करने की इकाई है, जिसको उनके स्वाभाविक वातावरण में पूर्ण किया जाता है। इस तरह प्रोजेक्ट पद्धति में कार्य करने की योजना का निर्माण तथा उसका कार्यान्वयन किसी फल को प्राप्त करना है। यह पद्धति सामाजिक विज्ञान के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। शिक्षा शास्त्री योजनाओं के द्वारा सामाजिक समस्याओं के हल के प्रति सजग हैं। लेकिन भारतवर्ष में इस पद्धति का प्रयोग पर्याप्त मात्र में नहीं हो पाया है। अभी यह प्रयोगावस्था में है। इस पद्धति में कुछ जरूरी सोपान हैं, जिनका अनुसरण करना अत्यंत आवश्यक है है। वे स्तर इस तरह हैं-
1. परिस्थिति पैदा करना
2. योजना का चयन
3. उद्देश्य-निरूपण
4. योजना का कार्यक्रम
5. कार्यक्रम का कार्यान्वयन
6. कार्य का मूल्यांकन
7. कार्य का लेखा
योजनाओं का वर्गीकरण-
किलपैट्रिक महोदय के अनुसार योजनाओं को चार वर्गों में विभाजित किया गया है।
(1) अभ्यासात्पक इनका ध्येय छात्रों में क्षमता तथा कुशलता की वृद्धि करना होता जैसे मानचित्र बनाना, पाफ एवं रेखाचित्र, अभ्यास पुस्तकालयों में कार्य आदि।
(2) रचनात्मक अथवा उत्पादनात्मक इसमें कार्य की रचना भौतिक रूप में की जाती जैम कुआं खोदना, मॉडल निर्माण आदि ।
(3) उपभोगात्मक- इनका ध्येय अनुमति की प्राप्ति होती है: जैसे कविता बनाना, पढ़ना, सुनाना, संगीन, कहानी कहना एवं सुनना आदि।
(4) समस्यात्पक- इनका उद्देश्य किसी समस्या का समाधान करना होता है, जैसे-बम्बई बड़ा नगर क्यों हो गया? सूर्य-महण क्यों लगता है? भारतीय किसान निर्धन क्यों हैं? आदि।
योजना-पद्धति के गुण
1. सामाजिक गुणों तथा आदतों के निर्माण में मददगार।
2. इसके प्रयोग से समन्वय सरलता से स्थापित हो जाता है।
3. स्वाध्याय की आदत का निर्माण करती है।
4. प्रजातांत्रिक गुणों का विकास करती है।
5. यह विधि मनोवैज्ञानिक है, क्योंकि यह सीखने के सिद्धांतों पर आधारित है। इसके अलावा इसमें स्वाभाविकता पायी जाती है।
6. छात्रों में सतत प्रयत्नशीलता तथा रचनात्मक सक्रियता के विकास में मददगार हैं।
7. इसके द्वारा शिक्षालय जीवन को जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से संबंधित किया जाता है।
8. कला-शिक्षण के दोषों को दूर करने में मददगार है।
9. इसमें बालक स्वक्रिया द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है जो स्थायी होता है।
योजना-पद्धप्ति के दोष तथा सीमाएं
1. इसके द्वारा ज्ञान को खंडों में विभाजित करके प्रदान किया जाता है। इस तरह इसमें कोई तारतम्य तथा क्रम नहीं होता ।
2. यह विधि व्ययशील है।
3. इसके द्वारा शिक्षण करने में बहुत समय लगता है।
4. सामाजिक विज्ञान में इस पद्धति के उपयोग के लिए पुस्तकों का अभाव पाया जाता है।
(3) व्याख्यान पद्धति-
शिक्षण में इस पद्धति का प्रयोग प्राचीनतम है। व्याख्यान का तात्पर्य पाठ को भाषण के रूप में पढ़ाने से है। इसमें शिक्षक अपने मुख से बात कहकर पढ़ता है। इस कारण उसको 'कथन-विधि' के नाम से पुकारा जाता है। इसमें शिक्षक क्रियाशील रहकर बालकों के सामने किसी विषय की विवेचना पेश करता है। सामाजिक विज्ञान में इस विधि का उपयोग उच्च कक्षाओं के लिए ज्यादा उपयुक्त है। इस पद्धति की सफलता दो तथ्यों पर निर्भर है। प्रथम-पाठ्य-वस्तु का चयन तथा द्वितीय-उस पाठ्य सामग्री का प्रस्तुतीकरण करने का ढंग। प्रस्तुतीकरण का ढंग शिक्षक या वक्ता के व्यक्तित्व पर निर्भर है। सामाजिक विज्ञान का शिक्षक इस पद्धति का उपयोग निम्न बातों हेतु कर सकता है-
1. किसी बड़ी इकाई अथवा प्रकरण या जटिल विषय का पुनरावलोकन करने हेतु ।
2. छात्रों के अध्ययन को परिपूरित करने हेतु ।
3. किसी विषय की व्याख्या तथा स्पष्टीकरण करने हेतु ।
4. बालकों के समय की बचत करने हेतु ।
5. नवीन कार्य के समय निर्धारण हेतु ।
6. नवीन कार्य के समय निर्धारण के लिए।
7. छात्रों को स्वाध्याय हेतु तत्पर बनाने के लिए।
8. किसी पाठ का सारांश देने के लिए।
व्याख्यान-पद्धति के गुण-
1. एकाग्रचित्त होकर कार्य करने की आदत का निर्माण ।
2. यह पद्धति समय एवं धन-दोनों दृष्टि से मितव्ययी है।
3. रुचि जायत करने में मददगार है।
4. शिक्षक एवं छात्रों के मध्य ज्ञान का प्रत्यक्ष आदान-प्रदान करती है।
व्याख्यान-पद्धति के दोष
1. बालक को निष्क्रिय श्रोता बनाती है।
2. बालकों की रुचियों, प्रवृत्तियों तथा अभिरुचियों हेतु इस पद्धति में कोई स्थान नहीं है।
3. शिक्षक का एकाधिकार शिक्षण प्रक्रिया में नीरसता पैदा करता है।
(4) प्रयोगशाला पद्धति-
कुछ समय पहले प्रयोगशाला को विज्ञान की शिक्षा तक सीमित समझा जाता था। लेकिन वैज्ञानिक प्रवृत्ति ने अब इसको हर विषय की शिक्षा के लिए जरूरी बना दिया है सामाजिक विषयों की शिक्षा हेतु भी प्रयोगशाला का होना जरूरी है। पाश्चात्य देशों में इसके शिक्षण के लिए प्रयोगशाला का प्रयोग किया जा रहा है। हमारे देश के शिक्षालयों में इन विषयों के शिक्षण के लिए प्रयोगशालाओं की स्थापना की तरफ ध्यान दिया जाने लगा है। लेकिन अभी उनकी व्यवस्था उचित रूप से नहीं हो पा रही है। सामाजिक विज्ञान में इस पद्धति का उपयोग बहुत लाभदायक है। इस पद्धति के प्रयोग में शिक्षक बालकों के लिए कार्य निर्धारित करता है तथा इसके बाद वह उससे संबंधित सामग्री की उपलब्धि के स्रोतों आदि के विषय में बता देता है। बालक उसके बाद अपना-अपना कार्य वैयक्तिक रूप से करते हैं। वह कार्य दो रूपों में हो सकता है। प्रथम-निरीक्षित एवं द्वितीय-अनिरीक्षित। प्रथम में शिक्षक उनके कार्य का निरीक्षण करता रहता है एवं आवश्यकतानुसार उनकी कठिनाइयों का समाधान करके उनका पथ-प्रदर्शन करता है। दूसरे में शिक्षक के द्वारा उनके कार्य का निरीक्षण नहीं किया जाता, बल्कि समस्त कार्य छात्र ही अपनी योग्यता के द्वारा करते रहते हैं।
सामाजिक विज्ञान की प्रयोगशाला के तत्व-
प्रो. जे. डब्ल्यू. वाल्डविन ने इसकी प्रयोगशाला के लिए निम्न सामग्रियों की जरूरत बतलायी-
1. बैठने के लिए स्थान-एक सामान्य कक्ष से बड़ा कक्ष। उसमें मेज एवं कुर्सियों की व्यवस्था ।
2. श्यामपट ।
3. सूचनापट ।
4. विषय की पाठ्य-पुस्तकें एवं अन्य सहायक संदर्भ पुस्तकें, उनको रखने की व्यवस्था, शब्दकोश आदि।
5. चार्ट, मानचित्र, ग्राफ, चित्र, ग्लोब, रेखाचित्र आदि।
6. पत्र-पत्रिकाएं एवं विविध प्रतिवेदन ।
7. फिल्म एवं स्लाइड्स ।
8. प्रोजेक्ट एवं स्क्रीन ।
प्रयोगशाला-पद्धति के गुण
1. वैयक्तिक विभिन्नताओं के अनुसार कार्य करने के सुअवसर ।
2. इसमें करके सीखने के सिद्धांत को आधार बनाया जाता है। इसमें बालक सक्रिय होकर स्वयं ज्ञानार्जन करता है।
3. वैयक्तिक विकास संभव है।
4. परंपरागत परीक्षा प्रणाली के दोषों का निवारण ।
इसके प्रयोग से सामूहिक शिक्षा के दोषों का निवारण किया जा सकता है।
प्रयोगशाला-पद्धति की सीमाएं
1. यह बहुत व्यय साध्य है।
2. छात्रोपयोगी पत्र-पत्रिकाएं एवं पुस्तकों का अभाव।
3. समुचित सावधानी न रखने पर इस पद्धति के यांत्रिक बनने का भय रहता है।
(5) समस्या-पद्धति-
यह पद्धति भी प्रयोजनवाद की देन है। योजना-पद्धति तथा समस्या-पद्धति में समानता होते हुए भी गहन अंतर है। इन दोनों पद्धतियों में बालक की क्रियाशीलता तथा रुचियों को महत्ता प्रदान की गई है। इसके अलावा ये दोनों ही समस्यात्मक स्थिति की प्रतिक्रिया पर आधारित हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण अंतर इस बात का है कि योजना-पद्धति में शारीरिक तथा मानसिक-दोनों प्रकार की क्रियाएं सन्निहित हैं, जबकि समस्या-विधि में सिर्फ मानसिक क्रिया की प्रधानता है। समस्या-पद्धति में बालक सिर्फ मानसिक तुष्टि प्राप्त करता है। यह पद्धति सिर्फ उच्च कक्षाओं में व्यवहार्य है। सामाजिक विज्ञान के शिक्षण में इस विधि का महत्वपूर्ण स्थान है। इसके द्वारा छात्रों का मानसिक तथा आलोचनात्मक चिंतन विकसित किया जाता है। सामाजिक तथा नागरिक समस्याओं का शिक्षण इस पद्धति के उपयोग से किया जा सकता है।
इस पद्धति में शिक्षक या तो स्वयं बालकों को समस्या प्रदान कर देता है अथवा छात्र स्वयं समस्या पेश कर देते हैं। समस्या का प्रस्तुतीकरण एक छात्र के द्वारा भी किया जा सकता है अथवा कई छात्र मिलकर उसको पेश कर सकते हैं। लेकिन इसके प्रयोग में इस बात पर बल दिया जाता है कि छात्र उसे स्वयं अपनी समस्या समझकर उसके समाधान के लिए हमेशा तत्पर रहें। समस्या का चयन उनके जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से होना चाहिए। इसके अलावा समस्या उनकी रुचि तथा उनके मानसिक स्तर के अनुकूल हो। इसके प्रयोग में निम्न स्तरों का अनुगमन करना जरूरी है-
1. समस्या का चयन तथा उसका प्रस्तुतीकरण ।
2. तथ्यों का मूल्यांकन एवं संभावित समाधान का निर्णय
3. समस्या से संबंधित तथ्यों का संग्रह तथा उनकी व्यवस्था ।
4. तथ्यों का विश्लेषण, आलोचना एवं उनके आधार पर निष्कर्ष निकालना ।
5. परिणामों अथवा निष्कर्षों का मूल्यांकन एवं सामान्यीकरण ।
6. समस्या का लेखा ।
सामाजिक विज्ञान में विभिन्न समस्याओं को उनके समाधान के लिए बालकों के सामने पेश किया जा सकता है; जैसे सुरक्षा की समस्या, कृषि की समस्या, कुटीर उद्योगों की समस्या, खाद्य समस्या, निर्धनता की समस्या आदि ।
समस्या-पद्धति के गुण
1. यह ज्ञानार्जन की मनोवैज्ञानिक पद्धति है।
2. यह समस्या समाधान की क्षमता पैदा करती है।
3. यह स्वाध्याय की आदत का निर्माण करती है।
4. इससे बालक समस्या हल करने की विधि सीख जाते हैं।
5. स्वप्रयत्न द्वारा ज्ञानार्जन संभव है।
6. वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास होता है।
7. मासिक अंतरिक्ष को विकसित करने में मददगार होती है।
8. छात्र तथ्यों का एकत्रीकरणः व्यवस्थापन तथा मूल्यांकन करना सीख जाते हैं।
समस्या-पद्धति के दोष तथा सीमाएं
1. छोटी कक्षाओं के बालकों हेतु व्यावहारिक नहीं है।
2. इसके बारंबार उपयोग से इसमें यांत्रिकता तथा नीरसता आने का भय रहता है।
3. इसमें हमेशा संतोषजनक निष्कर्षों पर नहीं पहुँचा जाता।
4. समय की दृष्टि से व्ययसाध्य है।
5. इसके प्रयोग के लिए निर्देशात्मक सामग्री की बहुत जरूरत है।
6. इसमें बालक की शारीरिक क्रिया की उपेक्षा की जाती है।
(6) इकाई-पद्धति-
सामाजिक विज्ञान के अध्ययन के लिए अमेरिका में इकाई विधि का बहुलता के साथ प्रयोग किया जा रहा है। इस पद्धति का जन्म गैस्टाल्ट मनोविज्ञान के परिणामस्वरूप हुआ। इस पद्धति के प्रवर्तक हेनरी सी. मौरिसन हैं। इन्होंने इकाई की व्याख्या इस प्रकार की है.
पहलू है।" "इकाई, संगठित विज्ञान एवं कला के वातावरण का विस्तृत और महत्वपूर्ण
इस परिभाषा के अंतर्गत प्राकृतिक एवं समाज-विज्ञान दोनों ही आते हैं। वेस्ले के मतानुसार, "इकाई सूचना एवं अनुभवों के उस संगठन को कहते हैं जो सीखने वाले के लिए महत्वपूर्ण परिणाम पैदा करने में मददगार हो।"
हेनरी मौरिसन ने हर इकाई के पाँच पद अथवा शीर्षक निर्धारित किये हैं। ये पद हरबार्ट के पाँच सोपानों के समान हैं। लेकिन इनमें अंतर इस बात का है कि हरबार्ट के सोपान शिक्षक प्रधान हैं पर मौरिसन के पदों में बालक को प्रधानता दी गई है। मौरिसन की इकाई-पद्धनि में अधोलिखित पदों का अनुगमन करना पड़ता है-
(1) अनुसंधान- इस स्तर पर बालकों को नवीन इकाई हेतु तैयार किया जाता है। इसमें उनके पूर्व ज्ञान का पता लगाया जाता है। यह कार्य लिखित अथवा मौखिक प्रश्नों या विचार-विमर्श किसी भी तरह से किया जा सकता है।
(2) प्रस्तुतीकरण- इस सोपान में शिक्षक नवीन इकाई के स्वरूप को बालकों के सामने पेश करता है। इसमें इकाई की विषय-वस्तु की सम्यक् विवेचना कर दी जाती है।
(3) आत्मसातीकरण- इसमें छात्रों के द्वारा पाठ्य-वस्तु को हृदयंगम किया जाता है। बालक पुनर्भरण, तर्क-वितर्क, शंका समाधान, निरीक्षित अध्ययन प्रयोगमाला आदि रोतियों को अपनाकर पाठ्य-वस्तु का व्यवस्थित रूप से लेखा करता है।
(5) अभिव्यक्ति- इस स्तर पर छात्र अपनी हृदयंगम तथा लिखित विषय-वस्तु को कक्षा के सामने व्याख्या द्वारा अभिव्यक्त करता है।
इन पदों की अवधि का पूर्ण निर्धारण नहीं किया जा सकता क्योंकि इनकी अवधि का निर्धारण इकाई की प्रकृति एवं छात्रों के ज्ञान तथा क्षमता पर निर्भर रहता है। सामाजिक विज्ञान में इस पद्धति का प्रयोग दो रूप से किया जाता है। प्रथम-शिक्षक-निर्मित इकाई के रूप में। इसमें इकाई का निर्माण शिक्षक द्वारा किया जाता है. लेकिन इसके निर्माण में बालकों के दृष्टिकोण का हमेशा ध्यान रखा जाता है। दूसरा रूप-छात्र-निर्मित इकाई है। ये इकाइयाँ छात्रों द्वारा शिक्षक के निर्देशन में निर्मित की जाती हैं। सामाजिक विज्ञान की कुछ इकाई इस तरह हैं-
1. प्रजातंत्र की स्थापना-(अ) घर, (ब) समुदाय, (स) विद्यालय ।
2. भारतीय प्रजातंत्र तथा विश्व ।
3. प्रजातंत्र में उत्तम् नागरिकों का निर्माण (अ) स्वास्थ्य, (ब) अवकाश काल में कार्य, (स) अपराधों से बचाव, (द) दुर्घटना तथा आग से सुरक्षा, (य) संस्थाओं तथा समुदायों से संबंधित कार्य।
4. सरकार की नीति एवं कार्य।
5. भारत में धार्मिक जागृति (अ) जैन धर्म (ब) बौद्ध धर्म, (स) वैदिक धर्म।
6. भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का प्रसार।
इकाई-पद्धति के गुण-
1. अभिव्यंजना-शक्ति का विकास होता है।
2. वैयक्तिक विभिन्नताओं की संतुष्टि होती है।
3. सामाजिक गुणों के विकास में मददगार है।
4. स्वाध्याय की आदत का विकास करने में मददगार होती है।
5. यह विधि बालक-प्रधान तथा मनोवैज्ञानिक है।
6. विषय के प्रति स्थायी रुचि पैदा करने में मददगार है।
7. बालकों को अध्यवसायी बनाने हेतु सुअवसर प्रदान करती है।
8. बालकों की लज्जाशील प्रवृत्ति तथा झिझक को दूर करती है।
इकाई-पद्धति के दोष-
1. अनुभूति के पाठों का इस विधि के द्वारा शिक्षण नहीं किया जा सकता है।
2. समय की दृष्टि से व्ययसाध्य है।
3. इसके द्वारा बालकों को या तो किसी पाठ-विशेष की पूर्ण जानकारी हो जाती है अथवा वे बिल्कुल कोरे रह जाते हैं।
4. थोड़ी-सी असावधानी इस पद्धति को यांत्रिक तथा नीरस बना देती है।
(7) समाजीकृत अभिव्यक्ति अथवा सामूहिक विचार-विमर्श प्रणाली-वेस्ले के अनुसार, समाजीकृत अभिव्यक्ति एक आदर्श है, जो शिक्षण में ऐसे प्रयोग की कल्पना करता है जिसमें कक्षा के सभी बालक सहयोग एवं सद्भावना से ज्ञानोपार्जन कर सकें। इस पद्धति के उपयोग से कक्षा के पर्यावरण की कृत्रिमता को खत्म करके स्वाभाविकता लायी जाती है। इसमें कक्षा में बैठने की व्यवस्था परंपरागत ढंग से नहीं होती, बल्कि चंद्राकार इंग से की जाती है है। इसको सामाजिक विचार-विमर्श के नाम से भी पुकारा जाता है। प्रो. बाइनिंग तथा बाइनिंग के मतानुसार, इस पद्धति के चार संभव स्वरूप हैं। वे इस तरह हैं-
(1) औपचारिक वर्ग-योजना- इसमें व्यवस्थित रूप से विचार-विमर्श किया जाता है । इसमें बालक उसी तरह कार्य करते हैं, जिस तरह प्रौढ़-अपनी कौंसिलों, अथवा क्लब आदि में करते हैं। इनमें अध्यक्ष की आज्ञा के बगैर प्रस्ताव आदि नहीं किये जाते हैं। बालक अपने में से किसी एक को सभा का अध्यक्ष चुनते हैं।
(2) अनौपचारिक वर्ग-योजना- इसके अंतर्गत कोई व्यवस्थित योजना के अनुसार कार्य नहीं होता। छात्र एवं शिक्षक स्वच्छन्द रूप से किसी भी समस्या पर विचार-विमर्श कर सकते
(3) आत्म-निर्देशक वर्ग-योजना- इसमें शिक्षक के निर्देशन अथवा उसकी उपस्थिति लिए कोई स्थान नहीं होता। इसमें बालक स्वयं विचार-विमर्श का संचालन करते हैं। यह जिना उच्च कक्षाओं के लिए सफल हो सकती है, क्योंकि छोटी कक्षाओं के बालक इतने रिपक्व नहीं हो पाते कि वे बगैर निर्देशन के कोई कार्य स्वयं कर सकें।
(4) सेमीनार वर्ग-योजना- यह योजना उच्चस्तरीय कक्षाओं के लिए है। इसमें कक्षा कई वर्गों में विभाजित कर दिया जाता है। पृथक-पृथक वर्गों को समस्या प्रदान कर दी जाती वे सभी वर्ग परस्पर विचार-विमर्श करके समस्या का समाधान करते हैं। फिर उसके बाद मीनार द्वारा समस्या का पूर्ण विवेचन किया जाता है।
इस पद्धति के प्रयोग में तीन सोपानों का अनुसरण आवश्यक रूप से करना पड़ता
मापान इस तरह हैं
1. तैयारी एवं योजना का निर्धारण.
2. वर्ग-व्यवस्था एवं वास्तविक विचार-विमर्श
3. मूल्याकन
समाजीकृत अभिक्ति के गुण
1. बालक इसके प्रयोग से योजना बनाना सीख जाते हैं।
2. सहयोग की भावना का विकास होता है।
3. दूसरों के प्रति आदर की भावना का विकास होता है।
4. सामाजिक गुण तथा आदतों का निर्माण होता है।
5. उत्तरदायित्व की भावना का विकास होता है।
6. आत्म-विश्वास पैदा करने में मददगार है।
7. स्वतंत्र तथा स्वस्थ चितन की कुशलता का विकास होता है।
समाजीकृत अभिर्व्याक्त पद्धति के दाष-
(1) इसमें थोड़े से छात्र ही क्रियाशील होते हैं।
(2) इसमें समय का अपव्यय अधिक होता है।
(3) विषयवस्तु का क्रमबद्ध ज्ञान प्राप्त नहीं हो पाता।
(4) छात्र व्यर्थ के तर्क-कुतर्क में भाग लेने लगते हैं।
(8) निरीक्षित अध्ययन-पद्धति-
अमेरिका में इस पद्धति का प्रचलन 19वीं शताब्दी के अंत में शुरू हो गया था। इसका उपयोग परंपरागत शिक्षण पद्धतियों के दोषों को दूर करने हेतु किया गया था। इस पद्धति ने शिक्षाशास्त्रियों का ध्यान इसलिए भी आकृष्ट किया कि इसके विपक्षियों ने एक स्वतंत्र पद्धति के रूप में प्रयुक्त न करके अन्य विधियों के साथ एक प्रविधि अथवा रीतियों के रूप में इसका प्रयोग किया। निरीक्षित अध्ययन कक्षा कक्ष अथवा प्रयोगशाला में पूर्व निर्धारित कार्य के संबंध में किया जाता है तथा उसका निरीक्षण और निर्देशन शिक्षक द्वारा किया जाता है। इसको 'निर्देशिन अध्ययन पद्धति' के नाम से भी पुकारा जाता है तथा उनकी क्रियाओं का शिक्षक अथवा निरीक्षक द्वारा निरीक्षण किया जाता है।
सामाजिक विज्ञान में इस पद्धति के प्रयोग हेतु पर्याप्त अवसर हैं। इसमें छात्रों का पहले से ही कार्य निर्धारित कर दिया जाता है। शिक्षक उस कार्य की रूपरेखा की विवेचना कर देता है। फिर समस्त बालक पृथक पृथक रूप से अपने कार्य को करते हैं तथा शिक्षक उनके कार्य का निरीक्षण और निर्देशन करता है। लेकिन निरीक्षण तथा निर्देशन हेतु दो पृथक व्यक्ति निर्धारित किये जा सकते हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि इस पद्धति के प्रयोग से छात्रों की विद्यालय की समस्त क्रियाओं का निरीक्षण तथा निर्देशन हो जाता है। लेकिन यह मत ठीक प्रतीत नहीं होता । वस्तुतः यह एक प्रविधि या रीति है, जिसका प्रयोग अन्य पद्धतियों के साथ किया जा सकता है है। यह पद्धति मुख्यतः दो दृष्टिकोणों से प्रयुक्त की जाती है। प्रथम-ऐसे बालको को ध्यान में रखकर जो कक्षा के अन्य बालकों से पिछड़े हुए हैं एवं द्वितीय-समस्त छात्रों को ध्यान में रखकर। इस पद्धति के प्रयोग के लिए प्रो. बाइनिंग ने निम्न योजनाएं पेश की हैं-
(क) सम्मेलन योजना:- यह योजना कक्षा के पिछड़े हुए बालकों की शिक्षा हेतु बहुत उपयोगी है। इसमें विशेष सम्मेलनों का आयोजन करके उनकी व्यक्तिगत कठिनाइयों तथा कमियों को दूर किया जा सकता है।
(ख) विशिष्ट शिक्षक योजना:- इसमें छात्रों को विशिष्ट शिक्षक अथवा अतिरिक्त शिक्षक नियुक्त करके सहायता प्रदान की जाती है। यह विशिष्ट शिक्षक उनकी कठिनाइयों, भ्रांत धारणाओं, दोषों आदि का निवारण करता है।
(ग) काल-विभाजन योजना:- इसमें छात्रों के अध्ययन के लिए कार्य प्रदान कर दिया जाता है। जब वे अपने कार्य में संलग्न हो जाते हैं, तब उसके कार्य का निर्देशन एक शिक्षक द्वारा किया जाता है एवं निरीक्षण दूसरे शिक्षक द्वारा। इस तरह इसमें दो शिक्षकों की आवश्यकता है, एक शिक्षक कम-से-कम ममय में छात्रों को निर्देशित कर देना है तथा दूसरा उनके कार्य निरीक्षण। इस तरह यह योजना मितव्ययी है।
(घ) द्विकाल योजना:- इसमें एक ही पाठ्य सामग्री को द्वि-समय चक्रों के लिये दे दिया है। एक समय चक्र के कार्य के संबंध में जरूरी बातें बना दी जाती हैं तथा दूसरे में उम कार्य का निरीक्षण और निर्देशन किया जाता है। मेवेल ई. सिम्पसन ने (४) मिनट के समय को दिन क्रम से विभक्त किया है-
(a) पुनरावलोकन 25 Minutes
(b) कार्य समर्पण25 Minutes
(c) अभ्यास 5 Minutes
(d) प्रदत्त कार्य का अध्ययन35 Minutes
(ड) सामयिक योजना- यह योजना क्रमिक रूप में प्रयुक्त न करके सामयिक रूप से उपयोग में लायी जाती है।
निरीक्षित अध्ययन-पद्धति के गुण-
1. वैयक्तिक विभिन्नता के अनुकूल शिक्षा प्रदान की जाती है।
2. पिछड़े बालकों की शिक्षा हेतु उत्तम पद्धति है।
3. इस पद्धति का सबसे मुख्य गुण यह है कि इसमें वैयक्तिक संलग्नता पर बन्न दिया जाता है।
4. शिक्षक एवं छात्रों के मध्य सौहार्द्रपूर्ण संबंध स्थापित करती है।
5. छात्रों में विभिन्न कुशलताओं, रुचियों, आदतों का विकास करने हेतु सुअवसर प्रदान करती है।
6. अनुशासन की समस्या के हल करने में मददगार है।
7. प्रजातांत्रिक गुणों के विकास में मददगार है।
निरीक्षित अध्ययन-पद्धति के दोष तथा सीमाएं
1. बालकों के आत्म-निर्भरता तथा आत्म-विश्वास के गुणों के विकास में आघात पहुँचाया जाता है।
2. इसके प्रयोग के लिए ज्यादा समय की जरूरत होती है।
3. इस पद्धति में तार्किकता का अभाव पाया जाता है।
4. यह व्ययसाध्य तथा कष्टसाध्य है।
(9) पर्यावलोकन पद्धति-
इसमें बालकों को स्वयं अन्वेषण करने हेतु प्रोत्साहित किया जाता है। सामाजिक विज्ञान के लिए यह पद्धति बहुत ही उपयोगी है। स्थानीय वातावरण सामाजिक विज्ञान की प्रथम पठ्य-पुस्तक है। इस स्थानीय वातावरण का ज्ञान प्राप्त करने हेतु सबसे आसान पद्धति पर्यावलोकन है। इस पद्धति के द्वारा बालक उस वातावरण की वास्तविकताओं का आसानी से शन प्राप्त कर सकते हैं। सामाजिक विज्ञान में इसके प्रयोग हेतु कक्षा के समस्त छात्रों को कई वर्गों में विभाजित कर दिया जाता है तथा हर वर्ग को पृथक-पृथक विषय का पर्यावलोकन करने से कार्य दे दिया जाता है। जब समस्त वर्ग अपने-अपने निर्धारित कार्यों का पर्यावलोकन कर रंग, तब सब मिलकर उन पर विचार-विमर्श करेंगे एवं परिणामों का निर्णय करेंगे। इसके बाद * उस कार्य को लेखबद्ध करेंगे जिससे उनके पास उस संबंध में कुछ सामग्री रह सके।
पर्यावलोकन पद्धृत के गुण-
(1) छात्रों को प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने का अवसर मिलता
(2) छात्र सक्रिय रहते हैं।
(3) उन्हें व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त होता है।
(4) उत्तरदायित्व निभाने का प्रशिक्षण मिलता है।
(5) आत्मविश्वास तथा स्वतंत्र रूप में कार्य करने की आदन का चिकाम होता है।
पर्यावलोकन पद्धति के दोष
(1) छोटी कक्षाओं हेतु यह विधि उपयुक्त नहीं है।
(2) अव्यवस्था तथा अनुशासनहीनता पैदा होने की संभावना रहती है।
(3) समय की दृष्टि में व्यर्थ माध्य है।
(10) स्त्रोत-पद्धति-
ज्ञानार्जन की क्रिया में प्रत्यक्ष अनुभव का सदैव में महत्व बना रहा है। परंतु 19वीं शताब्दी के अंतिम चरण में रटंत विद्या के विरुद्ध आवाज उठाई गई तथा प्रत्यक्ष अनुभव या स्रोत अध्ययन पर बल दिया गया। हम किसी वस्तु को स्वयं अपनी आंखों से देखकर जिनना ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, उतना उस वस्तु के विषय में पढ़कर अथवा किसी से सुनकर शायद हो अर्जित कर सकते हैं। इस तरह किसी अन्य द्वारा बताये गये अनुभवों की अपेक्षा प्रत्यक्ष अनुभव ज्यादा लाभदायक होते हैं। सामाजिक विज्ञान, इतिहास जैसे विषयों का ज्ञान अन्य किमी विधि की अपेक्षा स्रोत विधि से अधिक अच्छे ढंग से प्राप्त हो सकता है।
स्रोतों के प्रकार
स्रोतों को निम्न वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-
(i) मौखिक विवरण- रीति-रिवाज, गीत, दंत कथाएं, विवरण आदि।
(ii) लिखित स्रोत- हस्तलेख, रिपोर्ट, डायरी, पत्र, संधियाँ आदि ।
(iii) सामग्री संबंधी स्रोत- खंडहर, अस्त्र-शस्त्र, पोशाकें, मूर्तियाँ, सिक्के आदि।
सामाजिक विज्ञान में इस विधि को इतिहास मिश्रण के समान प्रयुक्त नहीं किया जा सकता है। सामाजिक विज्ञान के स्रोत बड़े ही व्यापक तथा विविध हैं; उदाहरणार्थ-ग्राम की झील, नदी, ऐतिहासिक स्थान मंदिर, कोई खंडहर आदि; लिखित सामग्री, दंत कथाएं आदि। समुदाय के जीवन का अध्ययन करने हेतु किये गये पर्यटन सामाजिक विज्ञान में स्रोत-विधि के लिए मूल स्रोतों के रूप में कार्य करेंगे। सामाजिक विज्ञान के शिक्षण में छोटी कक्षाओं के लिए इस विधि का प्रयोग वातावरण के निर्माण हेतु किया जाना चाहिए। उच्च कक्षाओं में इसका प्रयोग विवादास्पद प्रश्नों के निर्णय के लिए सफलतापूर्वक किया जा सकता है।
स्रोत पद्धति के गुण
(1) छात्रों में विषय के प्रति रुचि उत्पन्न करने में यह मददगार होती है।
(2) चिंतन एवं निर्णय-शक्ति के विकास में मददगार है।
( 3) सामुदायिक जीवन का वास्तविक चित्र पेश करने में सहायक है।
(4) छात्रों को क्रियात्मक ज्ञान प्रदान करती है।
(5) छात्रों में प्रामाणिक बातों को पहचानने की क्षमता का विकास करती है।
स्रोत-पद्धति की सीमाएं
1. वास्तविक महत्व के स्रोतों की उपलब्धि में कठिनाई होती है।
2. इसके प्रयोग में भाषा की कठिनाई बहुत महत्वपूर्ण है।
(11) विचार-विमर्श पद्धति-
आधुनिक शैक्षिक विचारधारा के अनुसार बालक को मात्र निष्क्रिय श्रोता नहीं माना जाना है बल्कि उसको सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय बनाये रखने पर बल दिया जाता है। बालक जिस ज्ञान को क्रिया करके प्राप्त करता है, वह स्थायी रहता है। उस बालक को सक्रिय बनाये रखने के दृष्टिकोण से विभिन्न क्रियात्मक शिक्षण विधियों का प्रयोग किया जाता है। उनमें से एक वाद-विवाद पद्धति है। वाद-विवाद एक शैक्षिक सामूहिक क्रिया है जिसमें शिक्षक एवं छात्र सहयोगी रूप से किसी समस्या अथवा प्रकरण पर बातचीत करते हैं। यह बात दो रूपों में की जा सकती है-(अ) औपचारिक रूप से एवं (ब) अनौपचारिक रूप से। औपचारिक रूप में हर कार्य विधिवत् ढंग से किया जाता है। इसका संचालन पूर्व-निर्धारित नियमों के अनुसार होता है। इस तरह की बातचीत में छात्र स्वयं में से सभापति, मंत्री एवं अन्य पदाधिकारी चुनते हैं। बातचीत में भाग लेने वाले सभी छात्र इन पदाधिकारियों के निर्देशन में कार्य करते हैं। इसमें शिक्षक की स्थिति एक साधारण सदस्य के रूप में होती है। औपचारिक बातचीत के प्रमुख रूप हैं-(i) पैनल, (ii) संगोष्ठी एवं (iii) वाद-विवाद प्रतियोगिता ।
अनौपचारिक बातचीत के संचालन के लिए निर्धारित नियमों की जरूरत नहीं है। इसमें छात्र किसी प्रकरण अथवा समस्या पर स्वतंत्रतापूर्वक विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।
इसमें शिक्षक ही नेतृत्व करता है।
विचार-विमर्श के गुण
(1) पद्धति के प्रयोग से सामूहिक शिक्षण के दोषों को दूर करने में बहुत मदद मिलती है।
(2) इसके द्वारा बालक स्वक्रिया द्वारा ज्ञानार्जन करते हैं।
(3) इसके द्वारा छात्र अपने विचारों को सुव्यवस्थित एवं क्रमिक रूप में प्रस्तुत करना सीख जाते हैं।
विचार-विमर्श पद्धति के दोष-
(1) यह पद्धति छोटी कक्षाओं के लिए अनुपयुक्त है।
(2) बच्चों को ज्ञान प्राप्त करने में अधिक समय लगता है।
(3) इसमें कक्षा के कुछ ही बच्चे सक्रिय रहते हैं।
(4) योग्य शिक्षक के निर्देशन में ही इस पद्धति का सफलतापूर्वक प्रयोग किया जा सकता है।
(12) कहानी विधि-
सामाजिक विज्ञान में इस विधि का प्रयोग प्रभावशाली ढंग से किया जा सकता है। छोटे बालक कहानी सुनने में विशेष आनंद का अनुभव लेते हैं। अतः सामाजिक विज्ञान की पाठ्य-सामग्री कहानी के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से बालकों को सुनाई जा सकती है। महावीर स्वामी, बुद्ध, गाँधी एवं शिवाजी की कथाएं रोचक ढंग से बालकों के सामने पेश की जानी चाहिए। इसी तरह कोलंबस एवं हिमालय अभियान की कथाएं भी बालकों को सुनाई जा सकती हैं। कहानी सुनाते समय अध्यापक को भाषा की सरसता तथा प्रवाह की तरफ विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए। कहानी अधिक लंबी न हो एवं उनमें आवश्यकतानुसार सहायक-सामग्री का भी प्रयोग किया गया हो। कहानी के मध्य में बीच-बीच में प्रश्न भी किये जा सकते हैं।
कहानी विधि के महत्व पर प्रकाश डालते हुए विद्वान एफ. आर. वार्टस लिखते हैं-"कहानी 13 वर्ष की अवस्था तक के बालकों को इतिहास पढ़ने का प्रमुख साधन होना चाहिए।" भूगोल के शिक्षण में भी कहानी विधि का प्रयोग प्रभावशाली ढंग से किया जाना चाहिए। श्री-नाथूराम शर्मा के शब्दों में, "जिस तरह इतिहास शिक्षण में छोटी आयु के बालक को ऐतिहासिक घटनाओं की जानकारी देने के लिए कहानियों का प्रयोग किया जाता है, उसी तरह निम्न कक्षाओं में कहानी के माध्यम से मानव भूगोल के मुख्य तत्व छात्रों के सामने पेश किये जा सकते हैं। इस स्तर पर कहानी पद्धति ज्यादा सफल हुई है क्योंकि वह ज्यादा मनोवैज्ञानिक है। कहानियों के माध्यम से छात्रों में नैतिक गुणों का विकास भी किया जा सकता है।"
आवश्यक सावधानियाँ- बालकों को कहानियाँ सुनाते समय अध्यापक को निम्न बातों ध्यान देना चाहिए-
(1) कहानी सुनाने से पहले उसका चुनाव सावधानीपूर्वक किया जाये। कहानी छात्रों के मानसिक स्तर के अनुकूल होनी चाहिए।
(2) जिस ऐतिहासिक अथवा भौगोलिक तथ्य से बिहानी संबंधित हो, उसकी अध्यापक को पूर्ण जानकारी होनी चाहिए।
(3) अध्यापक कहांनी कश कभी भी पुस्तक से पढ़कर न सुनायें।
(4) कहानी के सुनाने में काल क्रम का आवश्यक रूप में ध्यान रखा जाये।
(5) कहानी के मध्य में यथास्थान तथा आवश्यकतानुसार सहायक सामग्री का भी प्रयोग किया जा सकता है। प्राथमिक स्तर के छात्र चित्रों के माध्यम से कहानीसुनने में विशेष रुचि लेते हैं।
(6) जिस कहानी को अध्यापक सुनाये उसमें उसे पूर्ण रुचि लेनी तल्लीनता के साथ सुनायी जायेगी छात्रों पर उतना ही प्रभाव डालेगी ।
(8) कहानी की भाषा चाहिए।
(7) कहानी सुनाते समय अध्यापक को पूर्णतया तन्मय हो जाना चाहिए। कहानी जितनी
सरल तथा बालकों के मानसिक विकास के अनुकूल होनी चाहिए। कठिन शब्दों के प्रयोग कहानी की सरसता तथा मधुरता को खत्म कर देते हैं।
(9) कहानी की विषय-वस्तु से छात्रों के सामाजिक जीवन को वास्तविक परिस्थितियों से संबंधित करना जरूरी है।
(10) कहानी के मध्य में आवश्यकतानुसार प्रश्नोत्तर शैली को भी अपनाया जा सकता है।
(13) खेल विधि-
छोटे बालक खेल में विशेष रुचि लेते हैं। वे हर समय खेलना ही पसंद करते हैं। अगर उनके खेलने में बाधा डाली जाती है तो वे क्रोधित हो उठते हैं। खेल के आगे खाना-पीना तक भूल जाते हैं। वास्तव में खेल स्वाभाविकता, स्वतंत्रता तथा आनंद से परिपूर्ण एक मनोरंजक क्रिया है। खेल के अभाव में बालक की शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों का विकास संभव नहीं है। इससे बालक की रचनात्मक और क्रियात्मक शक्तियों का विकास होता है।
1. "जो कार्य हम स्वेच्छा से, स्वतंत्रतापूर्वक वातावरण में करें, वही खेल है।" - ग्लूक स्टनं
2. "खेल एक ऐच्छिक आत्म-नियंत्रित क्रिया है।"
सामाजिक विज्ञान में खेल-विधि- एक समय था जबकि खेल तथा शिक्षा के संबंध में कोई कल्पना ही नहीं करता था। शिक्षा में खेल को महत्व देने का श्रेय हेनरी काल्डवेल कुक को जाता है। उनके अनुसार, खेल बालकों की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। बालकों का सबसे ज्यादा मन खेल में लगता है। खेल माध्यम से जो कार्य किया जाता है, वह हृदय से किया जाता है।
कुछ के अनुसार, सभी विषयों का शिक्षण खेल पर आधारित होना चाहिए। उनके अनुसार खेल द्वारा शिक्षा देने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि कठिन विषय भी बालक के लिए सरल बन जाता है। खेल-विधि यथार्थ में अत्यंत मनोवैज्ञानिक प्रणाली है। क्योंकि इसमें बालक को अपनी रुचि एवं मानसिक क्षमता के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता रहती है। खेल द्वार शिक्षा प्राप्त करने से बालक की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक शक्तियों गतिशील होती हैं। बालक ज्ञान का प्रयोग जीवन की यथार्थ परिस्थितियों में करना सीखता है।
आवश्यक सावधानियाँ सामाजिक विज्ञान में खेल-विधि का प्रयोग करते समय निम्न बातों पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाये-
(1) किसी भी विषय का शिक्षण करते समय बालकों को यथासंभव स्वतंत्रता दी जाये। अगर खेल-विधि में भी बंधन का वातावरण रहेगा तो उसका उद्देश्य ही नष्ट हो जायेगा।
(2) खेल तथा पाठ्य सामग्री का समन्वय विशेष सावधानी से किया जाये।
(3) खेल विधि का प्रयोग करते समय बाल-रुचि एवं शारीरिक क्षमता का विशेष रूप से ध्यान रखा जाये।
(4) यथासंभव खेल इस तरह के हों जिनका संबंध पाठ्य-विषय के अलावा बालक के दैनिक जीवन से भी हो।
(14) आगमन विधि
"जब कभी हम बालकों के सामने बहुत से तथ्य, उदाहरण अथवा वस्तुएँ पेश करते हैं तथा फिर उनसे अपने स्वयं निष्कर्ष निकलवाने का प्रयत्न करते हैं, तब हम शिक्षण की आगमन विधि का प्रयोग करते हैं। लेण्डन
उपरोक्त परिभाषा के अनुसार इस विधि में विशेष तथ्यों अथवा उदाहरणों की मदद में मामान्य नियम निकलवाया जाता है। आगमन हमारे मस्तिष्क की एक विशेष क्रिया है, जो विशिष्ट वस्तुओं के निरीक्षण द्वारा हमको सामान्य सत्य या सिद्धान्त की तरफ ले जाती है।
उदाहरण - छात्र विभिन्न वस्तुओं का भार पहले वायु में तथा फिर जल में लेते हैं एवं पाइस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि सभी वस्तुओं का भार वायु की बजाय जल में कम है। इसलिए भी वह इस नियम का प्रतिपादन करते हैं. "सब वस्तुओं का भार वायु की बजाय जल में कम होता
इस विधि में नियम, सिद्धान्त तथा परिभाषा आदि को पहले नहीं बताया जाता है। छात्र कई तथ्यों, निरीक्षणों, उदाहरणों आदि का निरीक्षण, नियमों आदि पर स्वयं पहुंचते हैं। इस विधि में शिक्षण के तीन सूत्रों का उपयोग किया जाता है-
(1) ज्ञात से अज्ञात की ओर, (2) विशिष्ट से सामान्य की ओर, (3) स्थूल से सूक्ष्म की ओर। इस प्रकार यह विधि विश्लेषण से संश्लेषण की तरफ ले जाने वाली है।
आगमन विधि के पद
1. उदाहरण- छात्रों के सामने एक ही तरह के विभिन्न उदाहरण पेश करना।
2. निरीक्षण- उदाहरणों का निरीक्षण कर किसी सामान्य नियम पर पहुंचाने का प्रयत्न ।
3. नियमीकरण- छात्रों द्वारा उदाहरणों के आधार पर किसी नियम को निर्धारित किया जाना ।
4. परीक्षण- छात्रों द्वारा अन्य उदाहरणों की मदद से नियम का परीक्षण किया जाना ।
आगमन विधि के गुण-
(1) इसमें छात्र विभिन्न विधियों को स्वयं सम्पन्न करता है तथा सामान्य सिद्धान्त का निर्धारण भी स्वयं के प्रयत्न से करता है। शिक्षक को नियम बनाना नहीं पड़ता।
(2) सामान्य तथ्य पर छात्र स्वयं अपने निरीक्षण द्वारा पहुंचता है। अतः इस संबंध में उसके विचार स्पष्ट हो जाते हैं तथा प्राप्त ज्ञान मष्तिष्क में स्थायी होता है।
(3) यह छात्र हेतु आनन्ददायक विधि है। नवीन ज्ञान को अपने-आप प्राप्त कर वह प्रसन्नता का अनुभव करता है।
(4) इस विधि से छात्र में आत्म-निर्भरता तथा आत्म-विश्वास की भावना का विकास होता है।
(5) यह विधि प्रत्यक्ष तथ्यों पर आधारित होने से पूर्णतः वैज्ञानिक है।
(6) यह विधि स्थूल से सूक्ष्म की तरफ बढ़ने के कारण सरल तथा रोचक है।
(7) यह विधि छात्र को अभ्यास तथा स्वयं प्रयास करने का अवसर देती है। इस कारण बालक के मस्तिष्क का विकास करने हेतु बहुत प्रभावशाली है।
(8) यह विधि छात्र को अपने भावी जीवन में खोज तथा अन्वेषण करने हेतु प्रोत्साहित करती
आगमन विधि के दोष-
आगमन विधि के निम्न दोष हैं-
(1) यह विधि बहुत धीमी है, क्योंकि छात्र एक सिद्धान्त पर पहुंचने में बहुत समय ले लेते हैं।
(2) इसमें कुछ विशिष्ट उदाहरणों के आधार पर सामान्य सिद्धान्त का निरूपण किया जाता है। पर यह अन्य दशाओं में भी सत्य होगा इसका 'नश्चय नहीं। यथार्थ सिद्धान्त की जाँच हेतु निगमन विधि का सहारा जरूरी होता है।
(3) यह छात्र को कभी-कभी गलत निष्कर्ष पर पहुंचा देती है।
(4) सिर्फ योग्य छात्र ही विशिष्ट तथ्यों * आधार पर सामान्यीकरण कर सकते हैं, यह सभी हेतु उपयुक्त नहीं।
निष्कर्ष- आगमन विधि के गुण तथा दोषों की विवेचना से स्पष्ट हो जाता है कि इसमें पों की बजाय गुण ज्यादा हैं। फिर भी यह उच्च कक्षाओं की बजाय निम्न कक्षाओं के लिए ज्यादा उपयोगी समझी जाती है।
(15) निगमन विधि
"निगमन विधि द्वारा शिक्षण में पहले परिभाषा अथवा नियम सिखाया जाता है फिर उसके अर्थ की सावधानी से व्याख्या की जाती है तथा अन्त में तथ्यों का प्रयोग करके उसे पूर्ण रूप से स्पष्ट किया जाता है।" -लेण्डन
इस प्रकार इस विधि में पहले नियम बता दिया जाता है तथा फिर प्रयोग, अवलोकन आदि की मदद से उसे सत्य सिद्ध किया जाता है। उदाहरण के लिए, छात्रों को पहले यह सामान्य नियम बता दिया जाता है कि वस्तुओं का भार वायु की बजाय जल में कम होता है। उसके बाद विभिन्न वस्तुओं का भार वायु तथा जल में लेकर यह सिद्ध किया जाता है कि यह नियम सत्य है।
निगमन विधि के सिद्धान्त
1. सामान्य से विशिष्ट की ओर पहले छात्रों को सिद्धान्त अथवा सामान्य नियम बता दिया जाता है तथा बाद में वह विशिष्ट की ओर बढ़ते हैं एवं उसका अभ्यास करते हैं। दूसरे शब्दों में, इसमें नियम से उदाहरण की तरफ बढ़ते हैं।
2. स्थूल से सूक्ष्म की ओर सैद्धान्तिक नियम की पुष्टि प्रत्यक्ष प्रयोग अथवा उदाहरण से की जाती है।
निगमन विधि के सोपान
1. नियम का बताया जाना छात्रों के सामने कोई नियम अथवा परिभाषा पेश करना।
2. प्रयोग अथवा उदाहरण नियम या परिभाषा को सत्य सिद्ध करने के लिए प्रयोग अथवा उदाहरण देना।
3. निष्कर्ष- प्रयोग अथवा उदाहरण द्वारा किसी निष्कर्ष पर पहुंचना।
4. अभ्यास अथवा परीक्षण- छात्रों द्वारा प्रयोग अथवा उदाहरण की मदद से निष्कर्ष का परीक्षण किया जाना; जैसे-गर्मी पाकर सभी वस्तुएँ फैलती हैं- इस नियम को बताकर पुनः उदाहरणों द्वारा उसे स्पष्ट करना ।
निगमन विधि के गुण-
(1) इससे ज्ञान तीव्र गति से प्राप्त होता है। छात्र सामान्य नियम जानते हैं सिर्फ थोड़े से उदाहरणों से उसकी सत्यता को प्रमाणित कर देते हैं।
(2) यह विधि उच्च कक्षाओं में उपयोगी है, क्योंकि वहाँ अमूर्त विचारों को छात्र समझ सकते हैं।
(3) इस विधि से पढ़ाने में कम समय लगता है।
(4) इस विधि के द्वारा छात्र उलझन में नहीं पड़ते ।
निगमन विधि के दोष-
(1) चूंकि इसमें सूक्ष्म से स्थूल की ओर एवं सामान्य से विशिष्ट की ओर बढ़ते हैं, अतः यह एक अमनोवैज्ञानिक विधि है।
(2) यह विधि तर्क तथा विचार शक्ति का विकास नहीं करती, क्योंकि सिद्धान्त पहले बता दिये जाते हैं।
(3) इसमें छात्र में रटने की आदत पड़ती है. क्योंकि वह नियमों तथा सिद्धान्तों को बगैर समझे हुए कण्ठस्थ करके भी काम चला सकते हैं।
(4) इसमें छात्र की बजाय शिक्षक ज्यादा सक्रिय रहता है, जबकि सफल शिक्षण हेतु छात्र को ज्यादा सक्रिय होना चाहिए।
(5) यह अनुकरण पर बल देती है. सूझ-बूझ पर नहीं।
(6) यह विधि किसी नियम अथवा सिद्धान्त की खोज करने में मदद नहीं देती।

0 Comments